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15 साल की उम्र में पीएचडी करने वाले तनिष्क ने अमेरिका में किया कमाल

छोटा पॉकिट बड़ा धमाका!

15 साल की उम्र में पीएचडी करने वाले तनिष्क ने अमेरिका में किया कमाल

Saturday August 04, 2018 , 5 min Read

बारह वर्ष की उम्र में ग्रेजुएशन और 15वें वर्ष में डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रहे केरल मूल के अमेरिकी प्रवासी तनिष्क अब्राहम ने सिद्ध कर दिया है कि शख्सियत बनने के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती है। तनिष्क को कैंसररोधी ट्रीटमेंट की खोज में खास अभिरुचि है। तनिष्क के पिता इंजीयनियर, मां डॉक्टर हैं।

तनिष्क अब्राहम

तनिष्क अब्राहम


तनिष्क को कैंसररोधी ट्रीटमेंट की खोज में खास अभिरुचि है। उन्हें टेनिस, चेस, टेबल टेनिस भी खेलना बहुत पसंद है। तनिष्क ने मात्र बारह वर्ष की उम्र में ग्रेजुएशन कर लिया था। अब 15वें वर्ष में डॉक्टरेट कर रहे हैं।

शख्सियत बनने के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती है। अपने हुनर और योग्यता से कम उम्र का किशोर भी करोड़ों में एक, खास शख्सियत हो सकता है क्योंकि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती है। ऐसी ही एक शख्सियत बन चुके हैं पंद्रह वर्ष के तनिष्क अब्राहम। तनिष्क मूल रूप से भारतीय हैं। उनके माता-पिता केरल से जाकर अमेरिका में बस गए हैं। पिता बिजोऊ अब्राहम सॉफ्टवेयर इंजीयनियर और मां ताजी अब्राहम वेटेरिनरी डॉक्टर हैं। उनका मानना है कि तनिष्क बहुत जुनूनी है। किशोर उम्र के तनिष्क में एक नहीं, कई तरह की योग्यताएं हैं। तनिष्क ने छह साल की उम्र में ही अपने पिता-माता से कॉलेज में दाखिले की इजाजत मांगी थी। शुरुआत में तो कोई प्रोफेसर उन्हे अपनी कक्षा में शामिल नहीं करना चाहता था। बमुश्किल एक प्रोफेसर राजी हुए। वह केवल पढ़ाई में ही अच्छे नहीं बल्कि पियानो भी बजा लेते हैं। उन्होंने एक ऐसा उपकरण बनाया है, जो जले हुए मरीजों के बड़े काम का है। इस उपकरण की मदद से बिना स्पर्श के ही मरीज का हार्ट रेट नापा जा सकता है।

तनिष्क को कैंसररोधी ट्रीटमेंट की खोज में खास अभिरुचि है। उन्हें टेनिस, चेस, टेबल टेनिस भी खेलना बहुत पसंद है। तनिष्क ने मात्र बारह वर्ष की उम्र में ग्रेजुएशन कर लिया था। अब 15वें वर्ष में डॉक्टरेट कर रहे हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन अधिकतम अंकों से स्नातक की डिग्री हासिल की है। तनिष्क को अपनी उपलब्धियों पर गर्व है। वर्ष 2015 में मात्र ग्यारह साल की उम्र में अमेरिकी कॉलेज से मैथ्स, साइंस और फॉरेन लैंग्वेज स्टडी में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने पर तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें बधाई पत्र भेजा था। तनिष्क कोई ट्यूशन आदि की मदद नहीं लेते बल्कि घर पर ही पढ़ाई करते हैं। कैलिफोर्निया प्रांत के सैक्रामेंटो के अमेरिकन रिवर कॉलेज ने तीन साल पहले सैक्रामेंटो प्रांत निवासी तनिष्क को अठारह सौ अन्य विद्यार्थियों के साथ सम्मानित किया था। वह उस साल अमेरिकन रिवर कॉलेज से स्नातक होने वालों में सबसे कम उम्र के छात्र रहे। इससे पहले उन्हें हाई स्कूल डिप्लोमा की उपाधि मिली थी। उस समय तनिष्क ने कहा था कि स्नातक होना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।

भारत के ऐसे तमाम होनहार बच्चे विदेशों में अपने हुनर का परचम लहरा रहे हैं। हाल ही में देवास (म.प्र.) के एक छात्र मोहिक का चयन पढ़ाई के लिए आष्ट्रेलिया ऑफ न्यू साउथ वेल्स यूनिविर्सिटी में हुआ है। उन्हे पांच साल तक प्रतिवर्ष पढ़ाई करने के लिए पांच लाख रुपए की छात्रवृत्ति भी मिलेगी। मोहिक ने सोलह साल की उम्र में विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के लिए एसएटी, एसीटी व आईएलटीएस परीक्षा वर्ष 2016 में अंडरग्रेज्युवेट रहते हुए इंदौर के एक कॉलेज से दी थी। परीक्षा में चयनित होने के बाद मोहिक को बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य था, इसलिए इस वर्ष उत्तीर्ण करने के बाद विदेश की चार यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के लिए उनको ऑफर मिले। मोहिक पिता डॉ. मुफिक गजधर के मुताबिक उनके बेटे ने आस्ट्रेलिया के सिडनी में न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया है।

इसी तरह मूल रूप से आंध्र प्रदेश की साईं कृष्णामूर्ति और मोहम्मद मुकर्रम अली को अमेरिका के एक कॉलेज में दाखिला मिला है। दोनों का खर्च अमेरिका सरकार वहन करेगी। हर महीने उनको छात्रवृत्ति भी मिलेगी। वे कहते हैं कि उन्होंने सपने में भी विदेश जाकर पढ़ाई करने की बात नहीं सोची थी। साईं कृष्णामूर्ति और मोहम्मद मुकर्रम अली ने दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (डायल) सामाजिक सरोकार के तहत आइजीआइ एयरपोर्ट (इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट) के समीप शाहाबाद दौलतपुर इलाके में डायल की मातृ कंपनी जीएमआर से व्यावसायिक कोर्स किया है। यहां से प्रशिक्षण लेकर मूल रूप से बरेली (उ.प्र.) के मोहम्मद हिलालुउद्दीन भी स्पेन के बार्सिलोना एयरपोर्ट पर सुपरवाइजर बन चुके हैं।

जहां तक होनहार तनिष्क की बात है, उनकी डॉक्टर मां ताजी कहती हैं- 'यह मेरे पति और मेरे पिता के लिए बड़े खुशी का अवसर है। तनिष्क को दादा-दादी बायोमेडिकल इंजीनियरिंग डिग्री के साथ देखना चाहते थे, उनका सपना पूरा हो गया है। हाल के कुछ दिन तनिष्क और उनके परिवार के लिए काफी अलग रहे हैं। डिग्री लेने के बाद तनिष्क और उसकी टीम ने यूएस डेविस मेडिकल सेंटर में प्रोजेक्ट दिखाया। इसके दो दिनों बाद वे लोग कैलिफोर्निया गए, जहां बायो मेडिकल इंजीनियरिंग कॉन्फ्रेंस में तनिष्क ने अपना डिजायन प्रदर्शित किया। उसके बाद तो उसे पूरी दुनिया से शोहरत मिल रही है।

भारत में ऐसे हुनरमंदों को प्रोत्साहित करने वाले टेक्नॉलोजी जॉएंट (एचसीएल) विद्याज्ञान के चार विद्यार्थियों को पूर्ण स्कॉलरशिप के साथ अमेरिकी संस्थानों में प्रवेश मिला है। विद्याज्ञान के चार छात्रों को अमेरिकी विश्वविद्यालयों बैबसन कॉलेज, ब्राइन माउर, यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर एवं हैवरफोर्ड कॉलेज में प्रवेश मिला है। यही नहीं, भारत में विद्यार्थियों ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी), नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (एनआईएफटी) जैसे संस्थानों में तथा दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों में प्रवेश मिला है। उत्तर प्रदेश के गांवों के आर्थिक रूप से कमजोर व प्रतिभाशाली (औसतन 87 प्रतिशत ज्यादा अंक वाले) विद्यार्थियों के लिए 2009 में शिव नडार फाउंडेशन द्वारा शुरू विद्याज्ञान ने अभी कुछ दिन पहले ही एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया था।

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