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मासिक धर्म को लेकर चुप्पी तोड़ना, नकारात्मक सामाजिक नियमों को बदलना अब और जरूरी हो गया है: यूनिसेफ

यूनिसेफ ने मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता संबंधी जागरुकता पैदा के लिए सप्ताह भर चली मुहिम ‘रेडडॉटचैलेंज’ शुरू की थी जिसे सोशल मीडिया पर अच्छी प्रतिक्रया मिली है।

सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र



नयी दिल्ली, यूनिसेफ भारत की प्रतिनिधि यास्मीन अली हक ने कहा है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी के बीच मासिक धर्म को लेकर चुप्पी की संस्कृति और प्रबल हुई है तथा इस चुप्पी को तोड़ना एवं इससे जुड़े नकारात्मक सामाजिक नियमों को बदलना अब और जरूरी हो गया है।


हक ने ‘मासिक धर्म स्वच्छता दिवस’ पर कहा, ‘‘कोविड-19 वैश्विक महामारी के बीच मासिक धर्म को लेकर चुप्पी की संस्कृति और प्रबल हुई है। समाज के वंचित तबकों की लाखों महिलाएं एवं लड़कियों के लिए गरिमा के साथ मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाए रखना और स्वयं को सुरक्षित रखना मुश्किल हो गया है।’’


यूनिसेफ ने हक के हवाले से जारी बयान में कहा कि कई महिलाओं के पास काम नहीं है, कई महिलाएं घर से दूर हैं और मासिक धर्म के समय उपयोग किए जाने स्वच्छता संबंधी उत्पादों तक उनकी पहुंच नहीं है।


उन्होंने कहा,

‘‘चुप्पी को तोड़ना, जागरुकता पैदा करना और नकारात्मक सामाजिक नियमों को बदलना अब पहले से भी अधिक जरूरी हो गया है।’’



यूनिसेफ ने मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता संबंधी जागरुकता पैदा के लिए सप्ताह भर चली मुहिम ‘रेडडॉटचैलेंज’ शुरू की थी जिसे सोशल मीडिया पर अच्छी प्रतिक्रया मिली है।


बयान में कहा गया है कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता की महत्ता और किशोरियों के समक्ष आने वाली समस्याओं को रेखांकित करने के लिए ‘मासिक धर्म स्वच्छता दिवस’ से पहले मुहिम शुरू की गई थी।


इसमें बताया गया है कि यूनिसेफ राष्ट्रीय युवा एम्बेसडर हिमा दास और मानुषी छिल्लर, दीया मिर्जा, अदिति राव हैदरी, डायना पेंटी, नीरू बाजवा जैसी हस्तियों के अलावा कई युवाओं ने इस मुहिम को समर्थन दिया।


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार शहरी इलाकों में 78 प्रतिशत महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 48 महिलाएं ही मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता से जुड़े उत्पाद इस्तेमाल कर रही हैं।


मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के महत्व को रेखांकित करने के लिए हर वर्ष 28 मई को ‘मासिक धर्म स्वच्छता दिवस’ मनाया जाता है।