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रेड लाइट इलाकों की रोशनी का रंग बदलने की कोशिश है ‘कट-कथा’

रेड लाइट इलाकों की रोशनी का रंग बदलने की कोशिश है ‘कट-कथा’

Saturday December 05, 2015 , 6 min Read

500 सेक्स वर्कर के साथ सीधे तौर पर जुड़ी हैं गीतांजलि....

कोठे में रहने वाले बच्चों को शिक्षित कर रही हैं....

‘कट-कथा’ से जुड़े 100 वालंटियर....


दिल्ली के रेडलाइट इलाके जीबी रोड जब गीतांजलि बब्बर जाती हैं तो वहां रहने वाली सेक्स वर्कर ना सिर्फ उनको प्यार करती हैं और गले लगाती हैं बल्कि उनको दीदी कहकर पुकारती हैं। आम इंसान भले ही यहां आने से कतराता हो लेकिन गीतांजलि बब्बर इस सब से बेखबर, यहां रहने वाली सेक्स वर्करों की जिंदगी में बदलाव लाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ इस सड़क पर रहने वाली महिलाओं को अपनी संस्था ‘कट-कथा’ के जरिये सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया है।

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‘कट-कथा’ की संस्थापक गीतांजलि ने इस संस्था को शुरू करने से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स किया। इस दौरान वो ‘अनंत’ नाम के थियेटर ग्रुप के साथ जुड़ी गई। जहां से उनका रूझान सामाजिक कार्यों की ओर हुआ। गांधी फैलोशिप के तहत इन्होने राजस्थान के चुरू जिले का ‘थिरपाली बड़ी’ नाम के एक गांव में दो साल बिताये। यहां उनको कई नये तजुर्बे हासिल हुए। इसके बाद इन्होने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन यानी ‘नाको’ के लिए काम करना शुरू किया। यहीं से इनका वास्ता दिल्ली के रेड लाइट इलाका जीबी रोड़ से हुआ। तब इनके मन में कई तरह के सवाल उठे कि वहां का माहौल कैसा होगा, कैसे वहां पर काम करना होगा ?

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वो बताती हैं कि “जब मैं पहली बार एक कोठे में गई तो वहां का माहौल देख तीन रातों तक सो नहीं पाई थीं मैं ये सोचने पर मजबूर थी कि दिल्ली के बीचों बीच और इंडिया गेट से कुछ ही दूरी पर हर मिनट लड़की बिक रही है, हर मिनट लड़की मर रही है, लेकिन उसके बारे में कोई सोचता ही नहीं। इस चीज ने मुझे अंदर तक हिला दिया था।” धीरे धीरे गीतांजलि अलग अलग कोठों में जाकर वहां की महिलाओं से मिलने लगी। उनकी तकलीफ जानने लगीं और कुछ वक्त बाद उनका वहां ऐसा रिश्ता बन गया कि वो किसी के लिए छोटी बहन बन गई तो किसी के लिए दीदी तो किसी के लिए बेटी। हालांकि उस दौरान कुछ कोठों में उनके साथ बुरा व्यवहार भी किया जाता था। लेकिन इन सब से बेपरवाह गीतांजलि ने कोठो में रहने वाली महिलाओं से मिलना जुलना नहीं छोड़ा।

एक दिन गीतांजलि को एक कोठे में रहने वाली महिलाओं ने काफी बुरा भला कहा और उनको अपने कोठे से बाहर कर दिया। इस घटना ने उनकी आंखों में आंसू ला दिये। तब एक दूसरे कोठे में रहने वाली महिला उनके पास आई और गीतांजलि से कहा कि वो उनको पढ़ा दे। गीतांजलि के दुख के आंसू अचानक खुशी में छलकने लगे। उन्होंने शनिवार और रविवार के दिन कोठे में रहने वाली महिलाओं को पढ़ाने का काम शुरू किया। शुरूआत में उनके इस काम में मदद की डॉक्टर रईस ने। जिनका जीबी रोड पर अपना अस्पताल भी है। उसी की ऊपरी मंजिल पर गीतांजलि ने कोठे में रहने वाली महिलाओं को पढ़ाने का काम शुरू किया। लेकिन थोड़े वक्त बाद उनको वो जगह खाली करनी पड़ी। इस तरह मजबूर होकर गीतांजलि को कोठों में जाकर पढ़ाना पढ़ा, क्योंकि जीबी रोड़ में रहने वाली महिलाएं अपने कोठे से दूसरे के कोठे नहीं जातीं थी।

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कुछ वक्त बाद गीतांजलि ने भी नौकरी छोड़ दी और अकेले ही वो उनको पढ़ाने का काम करने लगी। सच्ची निष्ठा और ईमानदार प्रयास का असर गीतांजलि के दोस्तों पर भी पड़ा। उनके दोस्त भी इस मुहिम में जुड़ने लगे। गीतांजलि का काम भी बंटा। उनको दोस्तों ने भी अलग अलग कोठों में जाकर हर रोज महिलाओं को पढ़ाने का काम शुरू किया। महिलाओं को पढ़ाने का असर ये हुआ कि कोठों में रहने वाले बच्चे भी उनसे पढ़ने को तैयार होने लगे। तब गीतांजलि ने फैसला लिया कि वो इन बच्चों को भी पढ़ाएंगी। मेहनत दोनों तरफ से हुई। बच्चों ने भी दिलचस्पी ली। रिश्ता बढ़ा। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनके साथ खेलने और समय-समय पर उन्हें फिल्में भी दिखाई जाने लगी। धीरे धीरे जब ज्यादा बच्चे इनके साथ जुड़ने लगे तब इन्होने जीबी रोड में ही एक जगह किराये पर ली। आज इनके यहां आने वाले बच्चों में से चार बच्चे दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके के एक स्कूल में भी पढ़ते हैं। एक बच्चे को पढ़ाई के लिए फैलोशिप मिली है। इनके पढ़ाये बच्चे फोटोग्राफी करते हैं, थियेटर करते हैं तो कुछ डांसर भी हैं। इतना ही नहीं इनके यहां के चार बच्चों का चयन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में हो चुका है। इस तरह गीतांजलि ने यहां के बच्चों को ना सिर्फ सपने देखना सिखाया है बल्कि अपने सपनों के साथ जीना भी बताया है।

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गीतांजलि के मुताबिक "इन कोठों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाओं के पास वोटर कार्ड तक नहीं है। ऐसे में ‘कट-कथा’ यहां रहने वाली महिलाओं को समाज में पहचान दिलाने के लिए वोटर आईडी कार्ड बनावाने में मदद कर रहा है। अब तक इनके जरिये जीबी रोड़ में रहने वाली 500 से ज्यादा महिलाएं अपना वोटर कार्ड, राशन कार्ड और आधार कार्ड बनवा चुकी हैं।" इसके अलावा महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उनका बैंक में खाता भी खुलवाती हैं। जीबी रोड़ की अंधेरी और अकेली दुनिया में रह रही महिलाओं को सम्मानपूर्वक जीने के लिए ‘कट-कथा’ नोटबुक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। कोठे में रहने वाली महिलाएं शिल्प कला, फोटो फ्रेम, कान के झुमके और बिंदी आदी बनाने का काम भी कर रही हैं। ताकि वो अपना आर्थिक विकास कर पाने में सफल हो सकें। यहां पर रहने वाली महिलाओं को एकजुट करने के लिए वो दिवाली, नववर्ष और दूसरे मौकों पर कई कार्यक्रम भी चलाती हैं। ‘कट-कथा’ में 7 लोगों की एक मजबूत टीम है, जबकि इनके साथ 100 वालंटियर भी जुड़े हैं।

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आज गीतांजलि और उनकी संस्था ‘कट-कथा’ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जीबी रोड में रहने वाले 66 बच्चों के साथ जुड़ा है। जिनमें चार साल से लेकर 18 साल तक के युवा शामिल हैं। हर बच्चे की ज़रूरत के हिसाब से कट कथा काम कर रही है। जिन बच्चों की ज़रूरतें ज्यादा हैं उनके साथ कार्यकर्ता रात-दिन लगे रहते हैं। बच्चों में आए आत्मविश्वास का आलम ये है कि अब बच्चे बेझिझक बताते हैं कि वो जीबी रोड में रहते हैं। अब गीतांजलि की इच्छा है कि सरकार 15 अगस्त को ‘सेक्स फ्री डे’ घोषित करे, ताकि उस दिन देश भर के कोठे बंद रहे और वहां रहने वाली महिलाएं उस दिन को अपनी मर्जी से जी सकें।

Website : www.kat-katha.org