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सिल्क से बनाया गंभीर घाव भरने का उत्पाद, वैश्विक स्तर के उत्पादों का निर्माण कर रही है कंपनी

'फाइब्रोहील' रेशम की मदद से ऐसे मेडिकल उत्पाद बना रही है, जो मधुमेह के बाद हुए घावों को भी भरने में कारगर साबित हो रहा है। फाइब्रोहील अपने उत्पाद के दम पर देश और दुनिया की अग्रिणी बायोटेक कंपनी बनने की ओर अग्रसर है।

फाइब्रोहील के संस्थापक भरत टंडन, सुब्रमण्यम शिवा और विवेक मिश्रा

फाइब्रोहील के संस्थापक भरत टंडन, सुब्रमण्यम शिवारामण और विवेक मिश्रा



बायोटेक्नालजी के क्षेत्र में अग्रणी कंपनी बनने की ओर अग्रसर फाइब्रोहील रेशम के इस्तेमाल से बेहतरीन मेडिकल उत्पाद बना रही है। कंपनी द्वारा बनाए गए उत्पाद आम मेडिकल उत्पादों की तुलना में न सिर्फ बेहतर हैं, बल्कि इसके दाम भी कम हैं। कंपनी द्वारा बनाया गए मेडिकल उत्पाद आज देश के प्रमुख सरकारी अस्पताल में इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं, इसी के साथ कंपनी ने रेशम किसानों के लिए भी नए मौके खोल दिये हैं।


साल 2017 में विवेक मिश्रा ने फाइब्रोहील की स्थापना सह संस्थापक भरत टंडन और सुब्रमण्यम शिवारामण के साथ मिलकर की थी। फाइब्रोहील मनुष्य के शरीर में हुए घाव भरने के लिए रेशम की मदद से बेहतरीन मेडिकल उत्पाद बनाने का काम करती है।


इस बारे में बात करते हुए विवेक बताते हैं,

“हम सिल्क की प्रोटीन से कई तरह के घाव भरते हैं। भारत में 33 हज़ार मीट्रिक टन सिल्क का उत्पादन होता है। सिल्क की मदद लेते हुए हम इलाज पर आने वाले खर्चों को कम कर सकते हैं। सिल्क के जरूरी प्रोटीन अलग करने के लिए हम विशेष तरह की तकनीक का उपयोग करते हैं।"

रेशम के साथ बढ़ी यात्रा

रेशम के साथ शुरुआत करने के बारे में बात करते हुए विवेक बताते हैं कि,

“उस दौरान ही मैंने रिसर्च करना शुरू किया कि सिल्क से कपड़ों के उत्पादन के अलावा और क्या किया जा सकता है? रेशम हमारी सभ्यता के साथ 5 हज़ार सालों से जुड़ा हुआ है। हमने कई संस्थानों के साथ बैठक और रिसर्च में हिस्सा लिया, जिसके बाद यह सामने आया कि हम रेशम को कपड़ा उत्पादन के अलावा भी अन्य तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। रेशम की बायोमेडिकल क्वालिटी के चलते इसका इस्तेमाल कर मेडिकल के क्षेत्र में बड़े स्तर पर लोगों की सेवा की जा सकती है और इससे किसानों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव आएगा।”


फाइब्रोहील उत्पाद

फाइब्रोहील उत्पाद



आम रेशम के उत्पादन में कूकून को उबलते हुए पानी में डालकर उससे रेशम अलग किया जाता है, जबकि फाइब्रोहील रेशम के जिस प्रोटीन का उपयोग करती है, वो वह बचा हुआ हिस्सा होता है, जो कूकून के शेल छोडने के बाद उसमें रह जाता है।

कंपनी के उत्पाद

फाइब्रोहील के उत्पाद मधुमेह के चलते हुए घाव, संक्रमित घाव, सर्जरी के बाद न भरे जा सके घाव आदि के लिए बेहद कारगर साबित हो रहे हैं। कंपनी फिलहाल कई तरह के उत्पाद बना रही है, इसमें संक्रमित और असंक्रमित घाव के लिए ड्रेसिंग, पाउडर और चोट के निशान (स्कार) में काम आने वाले उत्पाद शामिल हैं।


इस बारे में बात करते हुए विवेक बताते हैं कि,

“आमतौर पर बाज़ार में घाव भरने के लिए जो भी दवाएं मौजूद हैं वे घाव को बढ़ने से रोंकती हैं, जबकि घाव भरने का काम खुद शरीर करता है, लेकिन हमारा उत्पाद मानव शरीर द्वारा घाव भरने की प्रक्रिया के साथ भी सक्रिय तौर पर भाग लेता है।”

विवेक कहते हैं,

“अगर सिल्क से बना यह उत्पाद सफल होता है, तो इससे किसानों का भी भला होगा, मेडिकल क्षेत्र का भी भला होगा और मरीज का भी भला होगा। ऐसे में अगर हम इन तीनों आयामों को फायदा पहुंचाकर कंपनी को आगे ले जाते हुए रोजगार भी पैदा कर सके, तो इससे बेहतर हमारे लिए कुछ नहीं होगा।"


अब विस्तार है लक्ष्य

कंपनी की शुरुआती चरण में विवेक व अन्य संस्थापकों ने बूटस्ट्रैप किया, इसी के साथ भारत सरकार के डिपार्टमेन्ट ऑफ बायोटेक्नालजी की तरफ से भी कंपनी को शुरुआती निवेश मिला था। कंपनी में अब तक चार करोड़ रुपये तक का निवेश किया जा चुका है। कंपनी ने इस साल 2 करोड़ रुपये से अधिक के टर्नोवर का लक्ष्य रखा है। कंपनी कर्नाटक के कई हिस्सों से सिल्क का आयात करती है, इसी के साथ कंपनी सिल्क बोर्ड से भी मदद लेती है।  


उत्पाद के बारे में बात करते हुए विवेक कहते हैं,

“हमें मार्केट से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। सर्जन कम्युनिटी इस उत्पाद को पहचानते हुए इसे तवज्जो दे रही है। हमें अपने उत्पाद के द्वारा कई ऐसे घाव भी भरें हैं, जहां पैर काटने की नौबत आ गई थी। हमारा उत्पाद मधुमेह के चलते हुए गंभीर घावों में भी बेहद प्रभावी ढंग से काम करता है।”

गौरतलब है कि भारत में मधुमेह के चलते हर साल एक लाख लोगों के पैर काटने की नौबत आ जाती है।

भविष्य से क्या है उम्मीद?

कंपनी के भविष्य को लेकर विवेक कहते हैं,

“देश में ऐसी बायोटेक कंपनियाँ बेहद कम ही हुईं हैं, जिन्होने वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोड़ी है। हम वैश्विक स्तर पर बायोटेक के क्षेत्र में एक अग्रिणी कंपनी बनना चाहते हैं।"

फाइब्रोहील खुद की तकनीक को विकसित कर वैश्विक स्तर के मेडिकल उत्पाद बनाने की ओर अपने कदम बढ़ा रही है। फाइब्रोहील ने फिलहाल देश के मुख्य सरकारी अस्पतालों में अपने उत्पादों को उपलब्ध कराया है, चूंकि सरकारी अस्पतालों में बड़ी तादाद में गरीब लोग अपने इलाज के लिए जाते हैं, ऐसे में उन्हे सस्ते और बेहतर उत्पाद से खासा लाभ मिलता है। इसी के साथ कंपनी सरकार के कई टेंडरों के साथ भी जुड़ी हुई है।


फाइब्रोहील देश के कई राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल और असम में अपने उत्पाद के दम पर मेडिकल क्षेत्र में अपनी जगह पुख्ता कर रही है।